दशरथकृत शनि स्तोत्र

पौराणिक मान्यता के अनुसार अयोध्या के राजा दशरथ ने जब अपने जीवन में शनि के प्रभाव का अनुभव किया, तो उन्होंने शनिदेव की स्तुति में यह स्तोत्र रचा। कहते हैं कि दशरथ की सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर शनिदेव स्वयं प्रकट हुए और उन्हें अपना कृपा आशीर्वाद दिया। इसीलिए इस स्तोत्र को दशरथकृत शनि स्तोत्र के नाम से जाना जाता है। यह स्तोत्र आज भी शनि पीड़ा से राहत पाने के लिए विशेष रूप से पढ़ा जाता है और शनि उपासना का एक सरल तथा प्रभावी साधन माना जाता है।

यह स्तोत्र कैसे प्रकट हुआ?

शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि राजा दशरथ अपने राज्य की समृद्धि और प्रजा के कल्याण के लिए हमेशा देवताओं की उपासना करते थे। एक बार जब शनि की महिमा और उनके प्रभाव की चर्चा हुई, तो राजा ने शनिदेव को प्रसन्न करने का संकल्प लिया। उन्होंने शनि के रूप, गुण और पराक्रम का वर्णन करते हुए यह स्तोत्र गाया। शनि ने प्रसन्न होकर राजा दशरथ को वरदान दिया कि जो भी व्यक्ति श्रद्धा भाव से इस स्तोत्र का पाठ करेगा, उस पर मेरी कृपा बनी रहेगी। यही कारण है कि यह स्तोत्र शनि उपासना में विशेष स्थान रखता है।

शनि की पीड़ा और स्तोत्र का महत्व

शनि की साढ़े साती, ढैय्या और अष्टम शनि जैसी अवस्थाओं को लेकर बहुत से लोग चिंतित रहते हैं। ऐसी स्थिति में दशरथकृत शनि स्तोत्र को एक सरल उपाय बताया जाता है। माना जाता है कि यह स्तोत्र शनि को प्रसन्न करने के लिए राजा दशरथ ने स्वयं रचा था, इसलिए इसमें शनि की सच्ची स्तुति का भाव है। नियमित पाठ से शनि का कोप शांत होता है, ऐसी धार्मिक मान्यता है।

दशरथकृत शनि स्तोत्र (श्लोक)

नीलाञ्जनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥

इस श्लोक का सरल भाव यह है कि जो नीले अंजन के समान कांतिमान हैं, जो सूर्य के पुत्र हैं, जो यम के अग्रज हैं और छाया तथा मार्तंड (सूर्य) से उत्पन्न हुए हैं, उन शनैश्चर भगवान को मैं नमन करता हूं। इन कुछ शब्दों में शनि के स्वरूप, जन्म और उनके स्थान का संपूर्ण वर्णन समाहित माना जाता है।

पाठ विधि

  1. शनिवार के दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके शनि की मूर्ति या चित्र के सामने बैठें।
  3. पहले शनि देव का ध्यान करें, फिर यह स्तोत्र एकाग्र मन से बोलें।
  4. प्रयास करें कि यह स्तोत्र कम से कम एक बार तो अवश्य पूरा पढ़ा जाए।
  5. अंत में शनि को दीपक दिखाकर प्रणाम और प्रार्थना करें।

फलश्रुति

  • धार्मिक मान्यता के अनुसार नियमित पाठ से शनि की पीड़ा का प्रभाव कम होता है।
  • परिवार में क्लेश और बाधाओं में कमी आने की परंपरा है।
  • मन की शांति और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।
  • संकट के समय धैर्य और साहस बना रहता है, ऐसा विश्वास किया जाता है।

इस स्तोत्र के साथ शनि चालीसा और शनि पूजा विधि का पालन करने से शनि उपासना पूर्ण मानी जाती है। सभी ग्रहों की शांति के लिए नवग्रह चालीसा भी पढ़ी जा सकती है।

दशरथकृत शनि स्तोत्र का पूर्ण पाठ

ध्यात्वा सरस्वतीं देवीं गणनाथं विनायकम् ।
राजा दशरथः स्तोत्रं सौरेरिदमथाकरोत् ॥ १ ॥
दशरथ उवाच ।
नमः कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च ।
नमो नीलमयूखाय नीलोत्पलनिभाय च ॥ २ ॥
नमो निर्मांसदेहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयानक ॥ ३ ॥
नमः परुषगात्राय स्थूलरोमाय वै नमः ।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय नित्यतप्ताय वै नमः ॥ ४ ॥
नमः कालाग्निरूपाय कृतान्तक नमोऽस्तु ते ।
नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नमः ॥ ५ ॥
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय करालिने ।
नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुख नमोऽस्तु ते ॥ ६ ॥
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदायक ।
अधोदृष्टे नमस्तुभ्यं वपुःश्याम नमोऽस्तु ते ॥ ७ ॥
नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमो नमः ।
तपसा दग्धदेहाय नित्ययोगरताय च ॥ ८ ॥
नमस्ते ज्ञाननेत्राय काश्यपात्मजसूनवे ।
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत् क्षणात् ॥ ९ ॥
देवासुरमनुष्याश्च पशुपक्षिसरीसृपाः ।
त्वया विलोकिताः सौरे दैन्यमाशु व्रजन्ति च ॥ १० ॥
ब्रह्मा शक्रो यमश्चैव ऋषयः सप्ततारकाः ।
राज्यभ्रष्टाश्च ते सर्वे तव दृष्ट्या विलोकिताः ॥ ११ ॥
देशा नगरग्रामाश्च द्वीपाश्चैवाद्रयस्तथा ।
रौद्रदृष्ट्या तु ये दृष्टाः क्षयं गच्छन्ति तत् क्षणात् ॥ १२ ॥
प्रसादं कुरु मे सौरे वरार्थेऽहं तवाश्रितः ।
सौरे क्षमस्वापराधं सर्वभूतहिताय च ॥ १३ ॥
इति दशरथ कृत श्री शनैश्चर स्तोत्रम् ॥

ऊपर बताए गए लाभ धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं।