अन्नपूर्णा अष्टकम — अन्न और ऐश्वर्य की देवी
अन्न का अर्थ है भोजन और पूर्णा का अर्थ है पूर्ण करने वाली। इस प्रकार अन्नपूर्णा अर्थात वह माँ, जो संसार की हर क्षुधा को पूर्ण करती हैं। माँ अन्नपूर्णा भगवान शिव की अर्धांगिनी और जगत की अन्नदात्री हैं। उनके नाम में ही सब कुछ समा गया है — अन्न, धन, ऐश्वर्य और करुणा। अन्नपूर्णा अष्टकम उन्हीं माँ की आठ श्लोकों में की गई स्तुति है, जिसमें उनसे अन्न, ज्ञान और वैराग्य — तीनों की याचना की गई है।
माँ अन्नपूर्णा
परंपरा में माँ अन्नपूर्णा को स्वर्ण से सजे वस्त्र धारण करने वाली, एक हाथ में सोने का कटोरा और दूसरे हाथ में अमृत पात्र लिए हुए वर्णित किया गया है। वे भक्त को जीवन का आधार — अन्न — प्रदान करती हैं और उसके साथ ही संपन्नता भी। यही कारण है कि अन्नपूर्णा की पूजा में कभी भोजन की कमी न रहे, इसकी कामना की जाती है। अन्नपूर्णा अष्टकम में माँ से यही प्रार्थना है कि हमारे घर अन्न और धन दोनों का स्रोत अक्षय बना रहे।
काशी की मान्यता
माँ अन्नपूर्णा का काशी अर्थात वाराणसी से अटूट संबंध है। काशी को अन्नपूर्णा की नगरी माना जाता है, जहां कभी अन्न का संकट नहीं होता। मान्यता है कि स्वयं भगवान शिव काशी में भिक्षा मांगते हुए माँ अन्नपूर्णा से अन्न ग्रहण करते हैं, यही कारण है कि वहां के निवासी कभी भूखे नहीं रहते। काशी के अन्नपूर्णा मंदिर में माँ की स्वर्ण प्रतिमा के दर्शन और अन्नपूर्णा अष्टकम के पाठ की विशेष मान्यता है। जो भक्त इस अष्टकम का पाठ करता है, वह इसी काशी की माँ से जुड़ जाता है।
प्रसिद्ध श्लोक
अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे। ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति॥
इस श्लोक का अर्थ है — हे अन्नपूर्णे, हे सदा परिपूर्ण रहने वाली, हे शंकर की प्राणवल्लभा, हे पार्वति, ज्ञान और वैराग्य की सिद्धि के लिए मुझे भिक्षा दीजिए। यहां माँ से सांसारिक धन नहीं, बल्कि ज्ञान और वैराग्य की याचना है, क्योंकि माँ अन्नपूर्णा का मानना है कि सच्चा वैभव संतोष और ज्ञान में है। सरल भाषा में भक्त कहता है कि हे माँ, मुझे सिर्फ वह दे दो जो सदा काम आए।
पाठ विधि
अन्नपूर्णा अष्टकम का पाठ शुक्रवार के दिन विशेष फलदायी माना गया है। अन्नकूट के पर्व पर भी इस अष्टकम का विशेष महत्व है। पाठ से पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। माँ अन्नपूर्णा के चित्र के सामने दीप जलाकर अन्न या मीठे प्रसाद का भोग लगाएं। तत्पश्चात श्रद्धापूर्वक अष्टकम का पाठ करें। पाठ के बाद किसी भूखे को भोजन कराना अथवा अन्नदान करना विशेष पुण्य माना गया है, क्योंकि माँ अन्नपूर्णा की सेवा का सीधा अर्थ है किसी को अन्न देना।
अन्नपूर्णा अष्टकम का पूर्ण पाठ
लाभ
- अन्न और धन की कमी न रहे, यह विशेष मान्यता है।
- घर में सुख-समृद्धि और संतोष का वास होता है।
- ज्ञान और वैराग्य की सिद्धि के लिए यह अष्टकम उत्तम माना गया है।
- अन्नदान के साथ पाठ करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।
अन्नपूर्णा अष्टकम के साथ अन्नपूर्णा चालीसा का पाठ करना उत्तम है। पूर्ण विधि के लिए अन्नपूर्णा पूजा विधि देखें। समृद्धि की कामना हो तो लक्ष्मी चालीसा का पाठ भी साथ में कर सकते हैं।
ऊपर बताए गए लाभ धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं।