सुंदरकांड श्री रामचरितमानस का पाँचवाँ कांड है, जिसमें हनुमान जी की सीता-खोज, लंका-गमन और समुद्र-लंघन की प्रसिद्ध कथा है। सुंदरकांड का पाठ हनुमान भक्ति और राम-भक्ति का विशेष साधन माना गया है। मंगलवार, शनिवार और संकट के समय इसका पाठ करने का व्यापक प्रचलन है। इस लेख में सुंदरकांड पाठ की पूजा विधि, संकल्प, नियम और पाठ-क्रम दिए गए हैं।
सामान्य हनुमान पूजा की विधि हनुमान पूजा विधि पृष्ठ पर देखें।
सुंदरकांड का महत्व
रामचरितमानस के सुंदरकांड में हनुमान जी की शक्ति, बुद्धि और भक्ति का वर्णन है — सीता-खोज से लेकर लंका-दहन और अशोक-वाटिका तक। परंपरा में सुंदरकांड पाठ को संकट-निवारण और मनःशांति के साधन के रूप में महत्व दिया गया है। सुंदरकांड पाठ हनुमान चालीसा और रामायण-पाठ का पूरक साधन है।
सुंदरकांड पाठ कब करें?
- मंगलवार और शनिवार: हनुमान पूजा के विशेष दिन।
- संकट/कठिनाई के समय: संकटमोचन की भावना से पाठ का प्रचलन है।
- विशेष तिथियाँ: राम नवमी, हनुमान जयंती, दीपावली-आसपास के दिन।
सुंदरकांड पाठ की तैयारी
- शुद्ध, शांत स्थान और आसन की व्यवस्था करें।
- रामचरितमानस की प्रति (सुंदरकांड भाग) रखें।
- पूजा सामग्री — दीप, धूप, फूल, अक्षत, चंदन, नैवेद्य (चना, गुड़, केला)।
- हनुमान की मूर्ति/चित्र और आस-पास राम-सीता की मूर्ति/चित्र।
सुंदरकांड पाठ पूजा विधि (चरणबद्ध)
चरण 1 — स्नान एवं संकल्प
स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें, पूजा स्थल पर दीप जलाएँ और पाठ का संकल्प करें। संकल्प में 'अमुक' स्थानों पर अपनी जानकारी भरें:
पाठपूजनं करिष्ये।
चरण 2 — गणेश स्मरण एवं मंगलाचरण
रामचरितमानस का प्रचलित मंगलाचरण-श्लोक:
करिबे काज जगत के नीके।।
चरण 3 — हनुमान एवं राम-सीता का संक्षिप्त पूजन
पाठ के पूर्व राम-सीता और हनुमान का संक्षिप्त पूजन करें — आवाहन, आसन, गंध, पुष्प-अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य। प्रचलित प्रारूप:
नोट: [उपचार] का अर्थ है पूजा में देवता को चढ़ाई जाने वाली वस्तु या क्रिया (आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प-अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, पुष्पांजलि आदि)। मंत्र में जो उपचार उस समय अर्पित किया जा रहा है, उसका नाम [उपचार] के स्थान पर बोला जाता है — जैसे “… नमः पाद्यं समर्पयामि”, “… नमः गन्धं समर्पयामि”, “… नमः पुष्पं समर्पयामि” आदि।
चरण 4 — सुंदरकांड पाठ
सुंदरकांड का पाठ श्रद्धा और शांत भाव से करें। पाठ में उच्चारण की शुद्धता से अधिक श्रद्धा-भाव महत्वपूर्ण है। संभव हो तो पाठ एक ही बैठक में पूरा करने की परंपरा है; यदि बीच में रुकना पड़े तो श्रद्धापूर्वक अगली बैठक में पूरा करें। पूरा पाठ संभव न हो तो सुंदरकांड का चुना हुआ भाग भी श्रद्धापूर्वक पढ़ा जा सकता है।
चरण 5 — पाठ के बाद मंत्र-जप
पाठ के बाद हनुमान मंत्रों का जप करें:
तन्नो हनुमान् प्रचोदयात्॥
चरण 6 — आरती एवं प्रसाद
पाठ के अंत में हनुमान की आरती करें — आरती कीजे हनुमान लला की — और प्रसाद वितरित करें। अंत में क्षमा-प्रार्थना:
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वर॥
सुंदरकांड पाठ के नियम
- पाठ साफ-सुथरे स्थान पर, स्वच्छ आसन बिछाकर करें।
- पाठ की शुरुआत में दीप जलाने और अंत में आरती करने की परंपरा है।
- पाठ-विराम होने पर उचित हो तो दीप जलाए रखें; पाठ श्रद्धा से अगली बैठक में पूरा करें।
- बच्चों और बड़ों के सामूहिक पाठ का भी प्रचलन है — सब श्रद्धा से भाग लें।
- पाठ की पूर्णता से अधिक श्रद्धा-भाव महत्वपूर्ण है।
सुंदरकांड से जुड़ी विशेष मान्यताएँ
लोक-परंपरा में सुंदरकांड पाठ को शांति और संकट-निवारण का साधन माना गया है। ये मान्यताएँ क्षेत्र और परिवार के अनुसार भिन्न हैं। किसी भी फल-दावे को वैज्ञानिक प्रमाण के रूप में नहीं, बल्कि श्रद्धा-भाव के रूप में समझें।