होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की संध्या पर होलिका का दहन और विधिवत पूजन किया जाता है। यह अधर्म पर भक्ति की विजय, भक्त प्रह्लाद की रक्षा और बुराई के नाश का प्रतीक है। इस लेख में होलिका दहन पूजा की संपूर्ण विधि, सामग्री, मंत्र, परिक्रमा और नियम सरल भाषा में बताए गए हैं।

होलिका दहन का महत्व

हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को अग्नि में अभय प्राप्त था। वह भक्त प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठी, परंतु भगवान की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका जल गई। इसी स्मृति में होलिका दहन किया जाता है — बुराई का अंत और सत्पथ की विजय। मान्यता है कि होलिका दहन की अग्नि में घर-परिवार के संकट, रोग और नकारात्मकता का नाश होता है।

होलिका दहन कब करें?

  • होलिका दहन: फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा की संध्या/रात्रि में।
  • मुहूर्त: पंचांग के अनुसार प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद) में होलिका दहन का शुभ मुहूर्त होता है। भद्रा का काल समाप्त होने के बाद ही दहन किया जाता है।

होलिका दहन पूजा की सामग्री

  • लकड़ी, उपले, गोबर के कंडे (बड़कुल्ले),
  • कच्चा सूत या कलावा, लोटे में जल,
  • रोली, कुमकुम, हल्दी, अक्षत, फूल,
  • गुड़, चना, मूंग दाल, नई फसल की बालियाँ,
  • बताशे, मीठा/नैवेद्य, गाय का गोबर, कपूर, दीपक।

होलिका दहन पूजा विधि (चरणबद्ध)

चरण 1 — स्नान एवं संकल्प

होलिका दहन के दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। संध्या काल में होलिका के समीप जाकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पूजा का संकल्प लें:

ॐ होलिकायै नमः संकल्पमहं करिष्ये।

चरण 2 — गणेश एवं प्रह्लाद का ध्यान

पूजा के आरंभ में विघ्नहर्ता भगवान गणेश और भक्त प्रह्लाद का स्मरण करें, ताकि पूजा निर्विघ्न संपन्न हो:

ॐ गं गणपतये नमः। ॐ प्रह्लादाय नमः।

चरण 3 — होलिका का पूजन

होलिका (अग्नि-चूल) पर जल, रोली, कुमकुम, अक्षत, फूल और गुड़-चना चढ़ाएँ। पूजन करते समय उपचार-अर्पण के मंत्र का जाप करें:

ॐ होलिकायै नमः [उपचार] समर्पयामि।

नोट: [उपचार] का अर्थ है पूजा में देवता को चढ़ाई जाने वाली वस्तु या क्रिया (आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प-अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, पुष्पांजलि आदि)। जो उपचार उस समय अर्पित किया जा रहा है, उसका नाम मंत्र में [उपचार] के स्थान पर बोलें — जैसे “… नमः गन्धं समर्पयामि”, “… नमः पुष्पं समर्पयामि” आदि।

चरण 4 — सूत परिक्रमा

कच्चे सूत या कलावे को पकड़कर होलिका की तीन या सात बार परिक्रमा करें। साथ ही बुहारी (झाड़ू) और सूत से होलिका की पूजा करने की परंपरा है। परिक्रमा के बाद सूत/कलावा होलिका में अर्पित कर दें।

चरण 5 — होलिका दहन

पूजन के बाद होलिका को अग्नि प्रज्वलित करें। अग्नि के साथ गुड़, चना, मूंग दाल और नई फसल की बालियाँ अर्पित करें। बालियों को भूनकर (गुहिया) खाने की परंपरा है, जिससे अन्न की समृद्धि होती है। भक्त प्रह्लाद का स्मरण करते हुए प्रार्थना करें:

होलिका दहन काल में, शत्रु-संकट नाश हो।
प्रह्लाद की रक्षा जैसे, घर-परिवार की रक्षा हो॥

चरण 6 — आरती एवं प्रसाद

दहन के बाद अग्नि की आरती करें और भुने चने, गुड़ तथा मीठे का प्रसाद परिवार एवं पड़ोस में वितरण करें। होलिका की राख घर लाकर प्रवेश द्वार के दोनों ओर लगाने की परंपरा है, जो रक्षा का प्रतीक मानी जाती है।

होलिका दहन पूजा के नियम

  • होलिका दहन शुभ मुहूर्त (भद्रा मुक्त काल) में ही करें।
  • दहन के समय अग्नि से सुरक्षा की दूरी रखें और बच्चों का ध्यान रखें।
  • पूजा श्रद्धा और शुद्ध भाव से करें, वाणी में संयम रखें।
  • दहन के बाद होलिका की राख को पैरों तले न रौंदें।
  • जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और मिष्ठान का दान करना शुभ माना गया है।