गीता जयंती उस दिन के रूप में मनाई जाती है जब परंपरा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्ध-मैदान में अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश दिया था। यह दिन मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी (मोक्षदा एकादशी) को आता है। इस दिन गीता-पाठ, कृष्ण-पूजन और गीता-उपदेश के स्मरण का प्रचलन है। इस लेख में गीता जयंती पूजा की विधि, गीता-पाठ का क्रम, मंत्र और नियम दिए गए हैं।
सामान्य कृष्ण पूजा की विधि कृष्ण पूजा विधि और एकादशी व्रत की विधि एकादशी पूजा विधि पृष्ठ पर देखें।
गीता जयंती का महत्व
श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय ज्ञान-परंपरा के सबसे प्रमुख ग्रंथों में से एक है। इसमें कर्म, धर्म, भक्ति और ज्ञान का उपदेश है। गीता जयंती का भाव — गीता के ज्ञान का स्मरण और उसे जीवन में उतारना — माना गया है। इस दिन गीता-पाठ और कृष्ण-पूजन करने का विशेष प्रचलन है।
गीता जयंती कब मनाई जाती है?
गीता जयंती मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है — इसी दिन मोक्षदा एकादशी होती है। यह तिथि सामान्यतः नवंबर-दिसंबर में आती है। कुछ परंपराओं में गीता जयंती को मोक्षदा एकादशी से भिन्न दिन भी मनाया जाता है; सटीक तिथि के लिए स्थानीय पंचांग देखें।
गीता जयंती पूजा की तैयारी
- गीता की एक प्रति/पुस्तक रखें — सरल भाषा का संस्करण भी चलता है।
- कृष्ण की मूर्ति/चित्र और अर्जुन के साथ की झाँकी/चित्र (जहाँ उपलब्ध हो)।
- पूजा सामग्री — पंचामृत, पुष्प, अक्षत, तुलसी, चंदन, धूप, दीप, नैवेद्य (केला, मिश्री, मखाना, पंचमेवा), आसन, घंटी।
- गीता-पाठ के लिए शांत, स्वच्छ स्थान।
गीता जयंती पूजा विधि (चरणबद्ध)
चरण 1 — स्नान, संकल्प एवं गणेश स्मरण
प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें, संकल्प करें ('अमुक' स्थानों पर अपनी जानकारी भरें) और गणेश स्मरण करें।
गीतापाठपूजनं करिष्ये।
चरण 2 — कृष्ण का ध्यान एवं पूजन
कृष्ण का प्रचलित ध्यान-श्लोक (पूरा कृष्ण पूजा विधि में) करें और कृष्ण/गीता-ग्रंथ का पूजन करें — आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, गंध, पुष्प-अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्पांजलि। प्रारूप:
ॐ गीतापुस्तकाय नमः [उपचार] समर्पयामि।
नोट: [उपचार] का अर्थ है पूजा में देवता को चढ़ाई जाने वाली वस्तु या क्रिया (आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प-अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, पुष्पांजलि आदि)। मंत्र में जो उपचार उस समय अर्पित किया जा रहा है, उसका नाम [उपचार] के स्थान पर बोला जाता है — जैसे “… नमः पाद्यं समर्पयामि”, “… नमः गन्धं समर्पयामि”, “… नमः पुष्पं समर्पयामि” आदि।
चरण 3 — गीता-पाठ
गीता जयंती पर गीता का पाठ करने का विशेष प्रचलन है। पूरा पाठ संभव न हो तो चुने हुए अध्याय या कुछ श्लोकों का श्रद्धापूर्वक पाठ करें। गीता का प्रसिद्ध आरंभिक श्लोक:
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥
पाठ शुद्ध उच्चारण और शांत एकाग्रता से करें। गीता-पाठ के बाद गीता के मूल उपदेशों — कर्म, कर्तव्य और भक्ति — पर विचार-चर्चा करना कई घरों/मंडलियों में प्रचलन है।
चरण 4 — मंत्र जप
पाठ के बाद प्रचलित मंत्रों का जप करें:
तन्नो कृष्णः प्रचोदयात्॥
चरण 5 — आरती एवं प्रसाद
अंत में कृष्ण की आरती करें — आरती कुंजबिहारी की — और प्रसाद वितरित करें। अंत में क्षमा-प्रार्थना:
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वर॥
गीता जयंती के नियम
- गीता-पाठ शांत मन और स्वच्छ स्थान पर करें; जल्दबाज़ी में पाठ न करें।
- गीता के श्लोकों का अर्थ न समझें तो कोई बात नहीं — श्रद्धापूर्वक उच्चारण भी पाठ है।
- इस दिन व्रत/फलाहार स्वास्थ्य के अनुसार रखें; अनिवार्य नहीं।
- गीता-ज्ञान के प्रचार में सहयोग करना (पुस्तक-दान, पाठ-व्यवस्था) कई परंपराओं में प्रचलित है।