गायत्री माता को वेदमाता, ज्ञान की देवी और परब्रह्म की दिव्य शक्ति माना गया है। गायत्री मंत्र के देवता सवितृ (सूर्य) हैं, इसलिए इन्हें गायत्री/सावित्री के रूप में पूजा जाता है। इस लेख में गायत्री माता पूजा की संपूर्ण विधि, गायत्री मंत्र जप, जप के नियम और गायत्री जयंती पूजन सरल भाषा में दिए गए हैं।

गायत्री माता का महत्व

परंपरा में गायत्री मंत्र को वेदों का प्रतिनिधि मंत्र और सर्वश्रेष्ठ महामंत्र माना गया है। चारों वेदों की अधिष्ठात्री होने के कारण गायत्री को वेदमाता कहा गया है। मान्यता है कि माँ गायत्री के पाँच मुख पृथ्वी के पाँच तत्वों — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — के सूचक हैं। गायत्री माता की पूजा ज्ञान, बुद्धि, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति की कामना से की जाती है। गायत्री जयंती (ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी) पर विशेष पूजा और जप का प्रचलन है।

गायत्री माता पूजा कब करें?

  • गायत्री जयंती: ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। इस दिन माँ गायत्री का प्राकट्य हुआ माना जाता है।
  • नित्य साधना: ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पहले) में गायत्री मंत्र का जप प्रतिदिन करना उत्तम माना गया है।
  • पूर्णिमा: प्रत्येक पूर्णिमा को उपवास रखकर गायत्री माता की पूजा करने की परंपरा है।

गायत्री माता पूजा की सामग्री

  • माँ गायत्री की प्रतिमा या चित्र, लाल/पीला वस्त्र,
  • घी का दीपक, धूप, अगरबत्ती, कपूर,
  • चंदन, कुमकुम, रोली, अक्षत (साबुत चावल),
  • लाल पुष्प, कमल, फल, मिश्री, खीर (नैवेद्य),
  • रुद्राक्ष या तुलसी की माला, गंगाजल,
  • हवन हेतु: आम की लकड़ी, तिल, जौ, घी, हवन सामग्री।

गायत्री माता पूजा विधि (चरणबद्ध)

चरण 1 — स्नान एवं संकल्प

गायत्री जयंती या पूजा के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को साफ कर गंगाजल का छिड़काव करें। हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर पूजा-जप का संकल्प लें:

ॐ गायत्र्यै नमः पूजनं करिष्ये। ॐ गणं गणपतये नमः।

चरण 2 — गायत्री माता का ध्यान एवं आवाहन

पूजा आरंभ में विघ्नहर्ता गणेश का स्मरण करें। फिर माँ गायत्री का ध्यान करते हुए पूजा वेदी पर प्रतिमा/चित्र स्थापित करें और घी का दीपक जलाएँ:

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥

चरण 3 — पंचोपचार/षोडशोपचार पूजन

माँ गायत्री को चंदन का तिलक लगाएँ, कुमकुम-अक्षत अर्पित करें, पुष्प चढ़ाएँ और धूप-दीप दिखाएँ। पूजन में लाल पुष्प, कमल, चंदन, अक्षत, मिश्री, खीर, फल और पंचामृत अर्पण किए जाते हैं। उपचार-अर्पण के समय मंत्र का जाप करें:

ॐ गायत्र्यै नमः [उपचार] समर्पयामि।

नोट: [उपचार] का अर्थ है पूजा में देवी को चढ़ाई जाने वाली वस्तु या क्रिया (आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प-अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, पुष्पांजलि आदि)। जो उपचार उस समय अर्पित किया जा रहा है, उसका नाम मंत्र में [उपचार] के स्थान पर बोलें — जैसे “… नमः गन्धं समर्पयामि”, “… नमः पुष्पं समर्पयामि” आदि।

चरण 4 — गायत्री मंत्र जप

जप के लिए पद्मासन या सुखासन में सीधी रीढ़ के साथ बैठें। रुद्राक्ष या तुलसी की माला से अनामिका और अंगूठे से माला चलाएँ (तर्जनी उँगली का प्रयोग न करें)। ब्रह्म मुहूर्त में मौन और एकाग्रता के साथ गायत्री मंत्र का कम से कम 108 और अधिकतम 1008 बार जप करें:

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥

चरण 5 — हवन (वैकल्पिक)

यदि संभव हो तो पूजा के बाद हवन कुंड में आम की लकड़ी, तिल, जौ और घी से गायत्री मंत्र के साथ आहुतियाँ दें। मान्यता है कि हवन से वातावरण शुद्ध होता है और पूजा का पुण्यफल बढ़ता है:

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥ स्वाहा।

चरण 6 — आरती एवं प्रसाद

जप/हवन के बाद माँ गायत्री की आरती करें और खीर, मिश्री एवं फल का प्रसाद परिवार में वितरण करें। जप समाप्त होने के बाद कुछ समय मौन रहकर ध्यान करना शुभ माना गया है। श्रद्धा अनुसार गायत्री चालीसा का पाठ भी किया जा सकता है। इस दिन जरूरतमंदों को अन्न, गुड़ एवं गेहूँ का दान करना विशेष फलदायी है।

गायत्री मंत्र जप के नियम

  • जप ब्रह्म मुहूर्त या संध्या काल में शांत एवं पवित्र स्थान पर ही करें।
  • जप के दौरान मौन रखें — बातचीत, हँसी और ध्यान भटकना साधना की ऊर्जा को कमजोर करता है।
  • माला को अनामिका और अंगूठे से चलाएँ, तर्जनी उँगली का प्रयोग न करें और माला को नाभि से नीचे न ले जाएँ।
  • जप बीच में न तोड़ें — एक बार संकल्प कर आरंभ किया गया जप बिना बाधा पूरा करें।
  • क्रोध, विवाद और कटु वचन से बचें; इस दिन सात्विक भोजन ग्रहण करें।
  • गायत्री मंत्र श्रद्धा और एकाग्रता से ही जपा जाए; उच्चारण स्पष्ट रखें।