गणेश चतुर्थी हिंदू कैलेंडर के भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाई जाती है। यह भगवान गणेश के जन्मोत्सव का पर्व माना जाता है, इसीलिए इसे विनायक चतुर्थी और गणेशोत्सव भी कहा जाता है। इस दिन गणेश जी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है और परंपरा के अनुसार कुछ दिनों के बाद विसर्जन किया जाता है।

यह पर्व महाराष्ट्र में सबसे भव्य रूप में मनाया जाता है, परंतु अब पूरे भारत और विदेशों में प्रवासी भारतीय समुदायों में भी व्यापक रूप से प्रचलित है। यहाँ पर्व की पूजा विधि, स्थापना और विसर्जन का विस्तृत विवरण दिया गया है।

गणेश चतुर्थी का महत्व

गणेश जन्म कथा के अनुसार, शिव और पार्वती के पुत्र गणेश का जन्म भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को माना जाता है। पौराणिक परंपरा में गणेश को विघ्नहर्ता, बुद्धि के देवता और प्रथम पूजनीय कहा गया है। गणेशोत्सव का उद्देश्य विघ्न-निवारण, बुद्धि-विकास और कार्य-सिद्धि की कामना से गणेश की स्थापना और पूजन है।

गणेश जी का जन्म कैसे हुआ, इसकी विस्तृत कथा गणेश जन्म कथा पृष्ठ पर देखें।

गणेश चतुर्थी तिथि

  • मास: भाद्रपद (आमतौर पर अगस्त-सितंबर),
  • तिथि: शुक्ल पक्ष चतुर्थी,
  • अवधि: परंपरा के अनुसार 1.5 दिन से लेकर 10 दिन तक (अनंत चतुर्दशी तक); सामान्यतः 5, 7 या 10 दिन का उत्सव होता है।

गणेश चतुर्थी की सटीक तिथि, स्थापना मुहूर्त और चतुर्थी के समापन (तिथि क्षय/वृद्धि) का निर्धारण पंचांग से होता है। सटीक जानकारी के लिए स्थानीय पंचांग या पंडित देखें।

गणेश स्थापना विधि (अल्पकालिक प्रतिष्ठा)

गणेश चतुर्थी पर गणेश जी की मूर्ति अस्थायी रूप से स्थापित की जाती है और उत्सव के बाद जल में विसर्जित की जाती है। इसका मुख्य चरण इस प्रकार हैं:

  1. मूर्ति चयन: पर्यावरण-सुरक्षित (मिट्टी/पेपरमेशे) मूर्ति सबसे उपयुक्त मानी जाती है। रासायनिक रंगों वाली और प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) मूर्तियों से परहेज़ आधुनिक मार्गदर्शन में बताया गया है।
  2. स्थापना स्थान: घर में स्वच्छ स्थान (मंडप या चबूतरा) तैयार करें; सार्वजनिक मंडपों में पंडाल बनाकर सजाया जाता है।
  3. स्थापना मुहूर्त: पंचांग के अनुसार शुभ मुहूर्त में मूर्ति को स्थापित करें।
  4. आवाहन एवं प्राणप्रतिष्ठा: विधिपूर्वक (सामान्यतः पंडित के साथ) गणेश का आवाहन कर पूजा आरंभ करें।
  5. पूजन: षोडशोपचार (16 उपचार) से पूजन; दूर्वा, पुष्प, मोदक आदि अर्पित करें।
  6. आरती: प्रतिदिन (या परिवार की परंपरा के अनुसार) सुबह-शाम आरती करें।
  7. विसर्जन: उत्सव अवधि समाप्त होने पर मूर्ति का जल में विसर्जन करें।

गणेश चतुर्थी की संपूर्ण पूजा विधि

चरण 1 — स्नान एवं आचमन

प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा के आरंभ में आचमन (जल के तीन घूंट) करें:

ॐ केशवाय नमः। ॐ नारायणाय नमः। ॐ माधवाय नमः।

चरण 2 — गणेश ध्यान

गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम्।
उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्॥

चरण 3 — संकल्प

पंचांग के अनुसार स्थान-तिथि बोलकर गणेश प्रीति और कामना-सिद्धि के लिए संकल्प करें (प्रचलित प्रारूप में 'अमुक' स्थानों पर अपनी जानकारी भरें)।

ॐ विष्णुः विष्णुः विष्णुः। ॐ तत्सद्ब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे अमुकप्रदेशे अमुकग्रामे अमुकसंवत्सरे अमुकायने अमुकर्तौ अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरे अमुकनक्षत्रे अमुकगोत्रोत्पन्नः अहं अमुकशर्मा, श्रीगणेशप्रीत्यर्थं, अमुककामनासिद्ध्यर्थं च गणेशोत्सवं गणेशपूजां च करिष्ये।

चरण 4 — आवाहन एवं षोडशोपचार पूजन

मूर्ति का आवाहन करें और सामान्य क्रम में आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान (जल-पंचामृत), वस्त्र-यज्ञोपवीत, गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल और दक्षिणा अर्पित करें। प्रचलित प्रारूप:

ॐ गणपतये नमः आवाहनं समर्पयामि।
ॐ गणपतये नमः पुष्पं समर्पयामि।
ॐ गणपतये नमः धूपं समर्पयामि।
ॐ गणपतये नमः दीपं समर्पयामि।
ॐ गणपतये नमः नैवेद्यं समर्पयामि।

षोडशोपचार की पूरी सूची विभिन्न परंपराओं में थोड़ी भिन्न होती है; यहाँ सामान्य प्रचलित प्रारूप दिया गया है।

चरण 5 — दूर्वा एवं मोदक अर्पण

गणेश चतुर्थी में दूर्वा और मोदक का विशेष महत्व है। ताजी दूर्वा की 21 गांठें और मोदक अर्पित करें:

ॐ गणपतये नमः दूर्वाङ्कुरं समर्पयामि।
ॐ गणपतये नमः मोदकं समर्पयामि।

चरण 6 — मंत्र जप

पूजन के समय गणेश मूल मंत्र का जप करें:

ॐ गं गणपतये नमः।

गणेश गायत्री का जप भी प्रचलित है:

ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥

(गणेश गायत्री के पाठ में परंपराओं के अनुसार थोड़ा अंतर मिल सकता है।)

चरण 7 — आरती

पूजा के अंत में गणेश आरती करें। आरती के समय दीपक/कपूर घुमाते हुए घंटी बजाएँ।

गणेश आरतियाँ यहाँ देखें: जय गणेश देवा, सुखकर्ता दुःखहर्ता, शेंदुर लाल चढ़ायो

चरण 8 — पुष्पांजलि, प्रदक्षिणा एवं क्षमा

ॐ गणपतये नमः पुष्पाञ्जलिं समर्पयामि।

एक या तीन प्रदक्षिणा करें और अंत में क्षमा प्रार्थना करें:

आवाहनं न जानामि न जानामि तथार्चनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं महेश्वर।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥

उत्सव के दौरान नियम एवं आचरण

  • उत्सव अवधि में घर/मंडप में पूजा स्थल को स्वच्छ रखें।
  • सात्विक भोजन और शुद्धता का ध्यान रखें।
  • प्रतिदिन नियत समय पर आरती करें; कुछ परिवार प्रतिदिन पूजन करते हैं।
  • प्रचलित मान्यता के अनुसार गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन से परहेज़ किया जाता है; इसे श्रद्धा-विश्वास के अनुसार ही लें।
  • विसर्जन के लिए अल्पकालिक मूर्ति ही जल में विसर्जित की जाती है — स्थायी/मंदिर की मूर्ति का विसर्जन नहीं होता।

विसर्जन

उत्सव अवधि (सामान्यतः 1.5, 5, 7 या 10 दिन — अनंत चतुर्दशी) समाप्त होने पर गणेश प्रतिमा का जल में विसर्जन किया जाता है। विसर्जन से पहले अंतिम आरती और प्रार्थना की जाती है, फिर प्रतिमा को जल में प्रवाहित किया जाता है।

विसर्जन की पूरी विधि, समय और सावधानियों के लिए गणेश विसर्जन विधि पृष्ठ देखें।

गणेश चतुर्थी के लाभ

गणेश चतुर्थी की पूजा विघ्न-निवारण, बुद्धि-विकास, समृद्धि और सुख-शांति की कामना से की जाती है। ये आध्यात्मिक मान्यताएँ हैं; इन्हें कोई गारंटी नहीं माना जाना चाहिए।

गणेश पूजा की सामान्य दैनिक विधि के लिए गणेश पूजा विधि पृष्ठ देखें।

तिथि
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी
शुभ मुहूर्त
स्थानीय पंचांगानुसार स्थापना मुहूर्त देखें
पूजा समय
प्रातःकाल